Showing posts with label मेरे. Show all posts
Showing posts with label मेरे. Show all posts

Friday, May 27, 2011

आतंक

कातिलों के कातिल मना रहें हैं जश्न-इ-इन्साफ
क्या रंगे हाथों से करेंगे अमन का आगाज़ ?

न कोई सहर नयी , न कोई खूबसूरत शाम
न ख़त्म होगा जब तक ये सिलसिला-इ-क़त्ल-इ-आम ||

Sunday, September 2, 2007

जो बोया सो डुबाया

एक कहावत ही लगती है "जो बोया सो पाया"
क्योंकि हमने तो है जो बोया सो डुबाया ||

दो वक़्त की रोटी, तन पर कपड़ा और सर पर एक साया
पकवानों और महलों पर ना कभी ये जीं ललचाया ||

कर्जे कि ज़मीन को अपने पसीने से सींचा और जान लगाकर हल है चलाया
कभी नकली बीजों ने, कभी असली बारिश ने तो कभी सेठों और दलालों ने है कहर ढाया ||

अपने बाप और भाइयों को बारी बारी है गँवाया
अपनी इज़्ज़त कि अर्थी को भी इन्हीं कन्धों पे है उठाया ||

ऐसी ज़िन्दगी ने ही मौत कि सूली पर है चढाया
मौत ने भी सिर्फ कुछ आंकड़ों को ही बढाया ||

दर-ए-जन्नत से आवाज़ आई - "बन्दे, तूने जो बोया सो पाया"
मालिक लेकिन हमने तो जो बोया सो डुबाया ||

और एक सवाल दिल में उभर कर है आया
इस जन्नत को ज़मीन पर लाने का है कोई उपाया ?


Wednesday, August 29, 2007

ज़हन-ए-ज़ोर

खूब कही आपने मिर्ज़ा आपका है वाकई "अंदाज़े-बयाँ-और"
अब समझने में लगेंगे हमें उम्र बारह, उस पर ज़हन-ए-ज़ोर

Monday, August 27, 2007

इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते

ना कभी इश्क किया हमने , ना मुश्क लगाया अपने आप पर
अब सिर्फ ये किस्सा छुपाना बाक़ी है ||

मकसद ए जिन्दगी

मक़सद-ए-जिन्दगी ढूँढने में कहीँ ये उम्र ना बीत जाये
ना कोई मक़सद मिले या मंज़िल तो कम-स-कम ये उम्र ही बीत जाये ||