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Friday, May 27, 2011

आतंक

कातिलों के कातिल मना रहें हैं जश्न-इ-इन्साफ
क्या रंगे हाथों से करेंगे अमन का आगाज़ ?

न कोई सहर नयी , न कोई खूबसूरत शाम
न ख़त्म होगा जब तक ये सिलसिला-इ-क़त्ल-इ-आम ||

Wednesday, August 29, 2007

ज़हन-ए-ज़ोर

खूब कही आपने मिर्ज़ा आपका है वाकई "अंदाज़े-बयाँ-और"
अब समझने में लगेंगे हमें उम्र बारह, उस पर ज़हन-ए-ज़ोर

Monday, August 27, 2007

इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते

ना कभी इश्क किया हमने , ना मुश्क लगाया अपने आप पर
अब सिर्फ ये किस्सा छुपाना बाक़ी है ||

मकसद ए जिन्दगी

मक़सद-ए-जिन्दगी ढूँढने में कहीँ ये उम्र ना बीत जाये
ना कोई मक़सद मिले या मंज़िल तो कम-स-कम ये उम्र ही बीत जाये ||