कातिलों के कातिल मना रहें हैं जश्न-इ-इन्साफ
क्या रंगे हाथों से करेंगे अमन का आगाज़ ?
न कोई सहर नयी , न कोई खूबसूरत शाम
न ख़त्म होगा जब तक ये सिलसिला-इ-क़त्ल-इ-आम ||
Or Nomadic Nuggets. Or Periodic Piques. Or ... Occasional rants and chants mostly to keep search engines busy(at least their indexing parts).
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Wednesday, August 29, 2007
ज़हन-ए-ज़ोर
खूब कही आपने मिर्ज़ा आपका है वाकई "अंदाज़े-बयाँ-और"
अब समझने में लगेंगे हमें उम्र बारह, उस पर ज़हन-ए-ज़ोर
अब समझने में लगेंगे हमें उम्र बारह, उस पर ज़हन-ए-ज़ोर
Monday, August 27, 2007
इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छुपते
ना कभी इश्क किया हमने , ना मुश्क लगाया अपने आप पर
अब सिर्फ ये किस्सा छुपाना बाक़ी है ||
अब सिर्फ ये किस्सा छुपाना बाक़ी है ||
मकसद ए जिन्दगी
मक़सद-ए-जिन्दगी ढूँढने में कहीँ ये उम्र ना बीत जाये
ना कोई मक़सद मिले या मंज़िल तो कम-स-कम ये उम्र ही बीत जाये ||
ना कोई मक़सद मिले या मंज़िल तो कम-स-कम ये उम्र ही बीत जाये ||
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